अमित अठवाल
अंबाला कवरेज @ अंबाला। अंबाला छावनी की जमीन और संपत्तियों के मालिकाना हक से जुड़ी वर्षों पुरानी समस्या के स्थायी समाधान की मांग को लेकर हरियाणा की युवा नेत्री व टीम चित्रा की संस्थापक चित्रा सरवारा ने आज हजारों समर्थकों व अनेकों गणमान्य साथियों के साथ सदर बाजार चौक पर ‘फ्री-होल्ड अंबाला’ को लेकर धरना-प्रदर्शन किया। इस दौरान उन्होंने भाजपा सरकार पर तीखा राजनीतिक हमला बोलते हुए कहा कि वर्षों से इस मुद्दे पर केवल बैठकें हो रही हैं, लेकिन जनता को कोई स्थायी समाधान नहीं मिला। धरने को संबोधित करते हुए चित्रा सरवारा ने कहा कि पिछले 12 वर्षों से एक अभूतपूर्व स्थिति रही है—देश, प्रदेश और विधानसभा में एक ही सरकार है और स्थानीय विधायक सात बार चुने जाने के बाद अपने राजनीतिक प्रभाव के चरम पर हैं। ऐसी अनुकूल परिस्थितियों में भी फ्री-होल्ड का मुद्दा यूं ‘मीटिंग पर मीटिंग’ में भटकता रहे तो इसका कारण राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी ही हो सकती है, कुछ और नहीं।
उन्होंने कहा कि अंबाला छावनी की जनता किसी राजनीतिक कृपा की मांग नहीं कर रही, बल्कि अपनी संपत्ति पर वैधानिक और संवैधानिक अधिकार चाहती है। उन्होंने कहा कि आज अंबाला सदर की जनता अपने सात बार के विधायक से दशकों के अटूट समर्थन के बदले अपनी संपत्ति के अधिकार का जवाब मांग रही है।
चित्रा सरवारा ने कहा कि नब्बे के दशक में अनापत्ति प्रमाण-पत्र (एनओसी) की व्यवस्था अनिवार्य की गई और इसके बाद वर्ष 2000 के आसपास अंबाला छावनी के एक्साइज क्षेत्र की संपत्तियों की रजिस्ट्रियां बंद हो गईं। इससे पहले लोग अपनी संपत्तियों की रजिस्ट्री करा सकते थे, नक्शे पास होते थे और संपत्ति के आधार पर बैंक ऋण भी प्राप्त कर सकते थे। उन्होंने सवाल किया कि अंबाला में एनओसी की व्यवस्था अनिवार्य क्यों की गई और रजिस्ट्रियां किसकी वजह से और क्यों बंद हुईं? जनता को इसका स्पष्ट और सार्वजनिक जवाब मिलना चाहिए।
‘आजाद अंबाला कैंट’ मुहिम
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चित्रा सरवारा ने कहा कि 1947 में देश आजाद हो गया था, लेकिन अंबाला सदर आज भी आजाद नहीं हुआ है। 15 अगस्त, स्वतंत्रता दिवस से टीम चित्रा ‘आजाद अंबाला कैंट’ मुहिम शुरू करेगी। इसके तहत बूथ स्तर पर हस्ताक्षर अभियान, ऑनलाइन अभियान चलाया जाएगा और सभी प्रभावित तथा सक्रिय पक्षों और व्यक्तियों को जोड़ा जाएगा। उनके साथ मंथन और सुझाव लिए जाएंगे तथा उन सुझावों को ज्ञापन के रूप में हर उच्चस्तरीय संबंधित कार्यालय तक ले जाया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा किसी एक पार्टी या व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे अंबाला सदर का है और सदर की जनता को इसके लिए एकजुट होना पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि जब इतने वर्षों तक अंबाला के प्रतिनिधियों की सत्ता और सरकार के गलियारों तक सीधी पहुंच रही, तो संपत्तियों के मालिकाना हक का स्थायी समाधान क्यों नहीं हुआ? सवाल यह नहीं है कि सरकार कब और क्या घोषणा करती है, बल्कि यह है कि अंबाला छावनी की जनता को वास्तविक अधिकार कब मिलेगा।
उन्होंने कहा कि यह केवल रजिस्ट्री का मामला नहीं है। एनओसी, फ्री-होल्ड और बंद रजिस्ट्रियों की जटिल व्यवस्था ने हजारों परिवारों के लिए अपनी ही संपत्तियों का स्वतंत्र रूप से उपयोग, हस्तांतरण और आर्थिक लाभ लेना मुश्किल बना दिया है। अपनी जमीन पर निर्माण के लिए जटिल सरकारी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़े, नक्शा पास कराने में कठिनाई हो, संपत्ति के आधार पर सामान्य बैंक ऋण न मिल सके और हस्तांतरण की प्रक्रिया सहज न हो, तो सरकार की व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
चित्रा सरवारा ने कहा कि अंबाला छावनी में हजारों परिवार वर्षों से इस समस्या का सामना कर रहे हैं। किसी के पास जमीन है, किसी का मकान है और किसी की दुकान, लेकिन संपत्ति से जुड़े अधिकार और सरकारी प्रक्रियाएं आज भी उनके लिए परेशानी का कारण बनी हुई हैं।
उन्होंने मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी तथा केंद्र और राज्य सरकार से सवाल किया कि यदि अंबाला छावनी की जमीन और संपत्तियों से जुड़ी व्यवस्था में बदलाव के लिए कोई प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है, तो उसकी पूरी जानकारी जनता के सामने क्यों नहीं रखी जा रही? प्रस्ताव किस आधार पर तैयार हुए हैं, किन विभागों और अधिकारियों ने उन्हें तैयार किया है और क्या प्रभावित परिवारों, स्थानीय नागरिकों तथा जनप्रतिनिधियों से इस संबंध में राय ली गई है?
उन्होंने कहा कि यदि सरकार के पास इस समस्या की पूरी जानकारी थी, तो जनता को पहले विश्वास में क्यों नहीं लिया गया? और यदि जानकारी नहीं थी, तो इतने लंबे राजनीतिक अनुभव और प्रशासनिक व्यवस्था के बावजूद इतनी बड़ी समस्या से सरकार अनजान कैसे रही?
उन्होंने कहा कि वर्ष 2006 में रजिस्ट्रियां क्यों बंद हुईं, इतने वर्षों में स्थायी समाधान क्यों नहीं निकला और अब हजारों संपत्ति मालिकों के अधिकारों का वास्तविक स्वरूप क्या होगा—इन सवालों का सरकार को स्पष्ट जवाब देना होगा।
चित्रा सरवारा ने कहा कि यह उन परिवारों की मेहनत और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का सवाल है, जिन्होंने अपनी जिंदगी की कमाई से मकान बनाए, दुकानें खड़ी कीं और संपत्तियां अर्जित कीं। जबकि दूसरे शहरों में नई बस्तियां, बाजार और इमारतें विकसित हो रही हैं, ऐतिहासिक महत्व रखने वाला अंबाला छावनी अपनी ही संपत्तियों के मालिकाना हक के सवाल पर पीछे छूटता दिखाई दे रहा है।
उन्होंने कहा कि जनता अब केवल आश्वासन सुनने के लिए धरने पर नहीं बैठी है। उसे स्पष्ट नीति, स्पष्ट प्रक्रिया, स्पष्ट समयसीमा और सरकार की जवाबदेही चाहिए। सरकार को फ्री-होल्ड अंबाला से जुड़े पूरे मामले, प्रस्तावों और निर्णयों को सार्वजनिक करना चाहिए तथा संपत्ति मालिकों के अधिकारों का स्थायी समाधान सुनिश्चित करना चाहिए।
प्रदेश सरकार पर कटाक्ष करते हुए चित्रा सरवारा ने कहा कि चुनाव के समय जनता के दरवाजे तक पहुंचने वाली राजनीति अगर जनता की संपत्ति और अधिकारों के सवाल पर वर्षों तक सरकारी दरवाजों के बाहर खड़ी रहे, तो जनता सवाल जरूर पूछेगी। उन्होंने कहा कि वह इस मुद्दे को राजनीतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि अंबाला छावनी के हजारों परिवारों की वास्तविक परेशानी के रूप में उठा रही हैं।
उन्होंने दो टूक कहा कि अंबाला छावनी की जनता को अब आश्वासन नहीं—सच, स्पष्ट जवाब और अपनी संपत्ति पर अपना अधिकार चाहिए। जब तक सरकार मालिकाना हक नहीं देती, तब तक हम इस मुहिम को लेकर आगे बढ़ते रहेंगे और ‘फ्री-होल्ड अंबाला छावनी’ होने तक यह लड़ाई लड़ते रहेंगे। इस अवसर पर अंबाला छावनी के अनेकों गणमान्य व्यक्ति मौजूद रहे।









