अमित अठवाल
अंबाला कवरेज @अंबाला। निराकारी जागृति मिशन के गद्दीनशीन चेयरमैन, संत संवारनाथ चैरिटेबल ट्रस्ट बाहरी कुरुक्षेत्र के चेयरमैन, अघोर सिद्धनाथ अखाड़ा वृंदावन और संत सुरक्षा मिशन भारत के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष परमश्रद्धेय संत शिरोमणी, दिव्य ज्ञान रत्न, गायत्री पुरस्कार से विभूषित, सतगुरु कबीर साहेब और शिरोमणी सतगुरु रविदास रत्न से अलंकृत, श्री.श्री.1008 महामंडलेश्वर, एडवोकेट सतगुरु स्वामी ज्ञान नाथ जी महाराज ने कहा कि शरीर साधन है साध्य नही। दिखने वाला दृश्य और देखने वाला द्रष्टा है। परमात्मा को वस्तु की तरह ना खोजो स्वामी जी ने यह उदगार अंबाला नारायणगढ रोड गांव खतौली मोड पर स्थित निराकारी जागृति मिशन आश्रम मे रुहानी सत्संग और ब्रह्मज्ञान गोष्टी के दौरान व्यक्त किए। महामंडलेश्वर स्वामी जी ने कहा कि परमात्मा आपका अपना आप, मूल स्वभाव और निज स्वरूप है। विवेक और ब्रह्मज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो तुम स्वयं वह हो जिसको ढूंढ रहे हो। बस ज्ञान और ध्यान की आंखे खोलो। श्रद्धा और विश्वास के साथ भीतर उड़ान भरो। महासागर को पहचानो लहरों को नही। आकाश और चैतन्यता को पहचानो बादलों को नही। अनादि अनंत अस्तित्व आत्मा को पहचानो नाशवान और परिवर्तनशील शरीर और मन को नही। स्वामी जी ने कहा कि जिसने आकाश की चैतन्यता को समझ और जान लिया तो उसने परमात्मा को जान लिया। इसलिए इस तथ्य को भलिभांति समझ लो की परमात्मा खोजने वाली वस्तु नही बल्कि अपने आप मे खो जाने की योग युक्ति है। यह सोलह आने सच है कि जिसको खोज रहे हो यह खोजने वाला कौन है। बाहर खोज रहे हो भीतर कभी झांककर नही देखा। इसलिए आज का मानव असलियत से बेखबर हैं। मूढ मान्यताओं, कोरी कपोल कल्पनाओं, अर्थहीन बहसबाजी, निरर्थक रीति-रिवाज, अनाप-शनाप बाहरमुखी कर्मकांड, अंधविश्वास और अंदाजों मे उलझा हुआ है। जब परमात्मा का अनुग्रह और समय के हाकिम तत्ववेता सतगुरु का रहमोकर्म होगा तो प्रत्यक्ष अनुभव होगा और प्रमाण मिलेगा कि भीतर कोई वस्तु नही बल्कि चेतना है जिससे अपने मौलिक अस्तित्व का अनुभव होता है। इसी चैतन्यता को जानना पहचानना और रचनात्मक उर्जा मे ठहरकर आत्मप्रज्ञ होना ही मोक्ष मुक्ति और स्थाई अक्षय आत्मिक आनंद का द्वार है। महामंडलेश्वर स्वामी जी ने कहा कि भीतर उड़ान भरो चैतन्य साक्षी आत्मा को जानो। सबकुछ जानने वाले और अनुभव करने वाले को देख रही है साक्षी आत्मा। मनुष्य तो निमित्त मात्र है सबकुछ करने वाली तो परमात्मा की रचनात्मक उर्जा है। यह उर्जा परमचैतन्य है। जड़ चेतन मे समाई हई है। अखिल ब्रह्मांड मे ओत-प्रोत है। स्वामी जी ने कहा कि देखे और अनुभव किए बिना, ज्ञान, ध्यान,और पहचान के बिना, प्रत्यक्ष साक्षात्कार और अंगसंग एहसास किए बिना, खुली और बंद आंखो से दर्शन दीदार किए बिना कैसे मान लिया जाए कि वास्तव मे यह सच है। पढ़ी-पढ़ाई, सुनी-सुनाई, इधर-उधर से उधारी ली गई जानकारियों के आधार पर आंखे बंद करके अगर मान लिया जाए तो यह अपने साथ और परमात्मा के साथ सरासर धोखा, अंधविश्वास और अंधभक्ति होगी। महामंडलेश्वर स्वामी जी ने कहा कि जब तक खोजने वाले, देखने और सबकुछ जानने वाले का ज्ञान और पहचान नही तो असलियत का पता नही चलेगा। यहां यह कहना उचित होगा कि एकांत मे उपयुक्त स्थान पर बैठकर ध्यान करने से साधक बाहर से भीतर जाता है। आत्मज्ञान और आत्मबोध भीतर की चैतन्यता को प्रकट करता है। निरंतर प्रयास और अभ्यास से यह समझना, जानना और प्रत्यक्ष मे अनुभव करना कि मै तन, मन, वृद्धि, चित और अहंकार से पार एंव परे अडिग-अडोल कायम-दायम स्वतंत्र आत्मा हूं। यही असीम अनंत आत्मिक अक्षय आनंद और मोक्ष मुक्ति की परम-चरम अवस्था तथा मनुष्य जीवन की सबसे पहली और अंतिम उपलब्धि है।










